सामाजिक नागरिक संस्थाएं मायने और बुनियादी दृष्टिकोण
भारत में समाज और व्यवस्थाओं को एक सार्थक रूप प्रदान करने में सामाजिक नागरिक संस्थाओं की रचनात्मक और प्रभावकारी भूमिका रही है। यह समय है, जब संस्थाओं को अपने अस्तित्व की महत्ता समाज को महसूस करवाने की जरूरत है। यह प्रवेशिका संस्था के मायने और आवश्यक दृष्टिकोण पर आधारित है। इसका सपष्ट मकसद सामाजिक नागरिक संस्थाओं के बारे में जवाबदेय और रचनात्मक कथानक बनाने की कोशिश करना है। यह बेहद जरूरी है कि हम लोकतांत्रिक और सभ्य व्यवस्था में नागरक पहल और नागरिक संस्थाओं के वजूद को न केवल स्वीकार करें, बल्कि उनके संरक्षण के लिए निजी और संस्थागत स्तर पर पहल भी करें। इस प्रवेशिका में संस्थाओं कि उभरती भूमिका, उनकी चुनौतियों और आवश्यक रणनीतिक संचार पर केन्द्रित अवधारणाओं की बेहतर समझ बनाने के लिए उपयुक्त पठनीय सामग्री प्रस्तुत की गई है।
यह किताब पहला चरण है। दूसरा चरण है आपका पहल के लिए तैयार होना और अपने स्तर पर अपने लिए योजना बनाना। तीसरा चरण है एक दूसरे का साथ-सहयोग लेना। अगर हम इस किताब को व्यावहारिक रूप में लागू करने की आपकी योजना में सहभागी हो सकते हैं, तो हमें बताइएगा।
इस प्रवेशिका को पढ़कर और अभ्यास में लाकर सामाजिक नागरिक संस्थाओं से सम्बद्ध व्यक्ति:
- सामाजिक नागरिक संस्थाओं की मूल अवधारणा, उनकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और प्रासंगिकता पर अपनी स्पष्ट समझ बना सकेंगे।
- सभ्य समाज में इन संस्थाओं से अपेक्षित भूमिका को इस प्रकार रेखांकित कर सकेंगे जो कि संविधान और मानवीय मूल्यों के अनुकूल हो।
- इस वक्तव्य, “सामाजिक नागरिक संस्थाएं मूलतः समाज-जनपक्षीय नज़रिए में बदलाव की रूपरेखा तय करती हैं, सकारात्मक क्रियान्वयन को बढ़ावा देती हैं और जनवकालत करती हैं”, पर आप अपनी एक सुविचारित टीप अंकित कर सकेंगे।
