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मासिक धर्म — अनगिनत अंधविश्वास व पुरानी सोच से मुक्त होने की बारी

मासिक धर्म एक ऐसा विषय है, जिसके ग्रामीण इलाकों में अनगिनत अंधविश्वास और पुरानी सोच जुड़ी हुई है। सामाजिक प्रतिबंध के कारण यहां ऐसे विषयों पर बात करना भी पाप माना जाता है, जिस वजह से महिलाएं सही जानकारी के अभाव में बीमारियों का शिकार हो जाती हैं और उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

माहवारी के समय किशोरियों के साथ-साथ गरीब महिलाओं के स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना काफी आवश्यक है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (2015-2016) की रिपोर्ट की मानें तो ग्रामीण इलाकों में 48.5 प्रतिशत महिलाएं सेनेटरी नैपकिन (पैड) का उपयोग करती हैं, जबकि शहरी क्षेत्रों में 77.5 प्रतिशत महिलाएं इसका इस्तेमाल करती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी सैनिटरी नैपकिन को लेकर उम्रदराज महिलाओं की सोच रूढ़ियों से भरी पड़ी है। वे अपने बीच भी माहवारी के संबंध में बात करने से सकुचाती हैं। अंदरूनी अंगों की स्वच्छता के प्रति शर्म महसूस करती हैं। नतीजतन घर की किशोरियां भी खुलकर बातें करने में गुरेज करती हैं।

अब इस संबंध में मध्यप्रदेश के सुदूर इलाकों के दस्तक किशोरियों निजी संस्थाओं के सहयोग से ग्रामीणों को जागरूक करने का बीड़ा उठाया है। ग्रामीण आदिवासी व पिछड़ी जाति की किशोरियों ने ग्रामीण किशोरियों को मेंस्ट्रुअल कप के इस्तेमाल के बारे में बता रही हैं, जो अन्य सेनेटरी पैड की अपेक्षा महंगा तो है, परंतु इसे साफ कर कई वर्षों तक इसके उपयोग किया जा सकता है। इस कप को भोपाल की एक संस्था विकास संवाद ग्रामीण किशोरियों को निशुल्क उपलब्ध करा रही है। इसे इस्तेमाल करने के बाद किशोरियों ने बताया कि यह बेहद आसान, सुरक्षित और संक्रमणमुक्त है।

विकास संवाद से जुड़े राकेश मालवीय ने बताया कि दरअसल दस्तक परियोजना के तहत मध्यप्रदेश के छोटे शहर रीवा, सतना, उमरिया जैसे आदिवासी और अनुसूचित जाति की आबादी वाले क्षेत्रों में संस्था ने जब काम करना शुरू किया था। तभी माहवारी को लेकर बहुत सी भ्रांतियां देखा गया। यहां तक कि इसे ग्रामीण इलाकों में एक बीमारी की तरह देखा जाता है। किशोरियों को माहवारी होने पर उसे अलग-थलग छिपाकर अंधेरे कमरे में रखा जाता है, जिससे उनका मानसिक स्वास्थ्य पर बहुत बुरा असर पड़ता है। इन क्षेत्रों में ज्यादातर किशोरियों की पढ़ाई मासिक धर्म के बाद छूट जाती है। इस विषय पर किशोरियां खुलकर बात नहीं कर पातीं। संस्था ने सबसे पहले किशोरियों को इस मुद्दे पर बात करना सिखाया। धीरे-धीरे संस्था की प्रेरणा से किशोरियां सहज होकर बात करने लगी, तभी उन्हें मेंस्ट्रुअल कप के इस्तेमाल के बारे में बताया गया । मासिक धर्म जैसे विषय पर सुदूर ग्रामीण इलाकों में जाकर किशोरियों से बात करना एक चुनौती भरा काम है। लेकिन अंजलि के सहयोग से यह थोड़ा आसान हो गया।

मझगवां विकासखंड, सतना की पूजा चौधरी बताती है कि यह कप महंगा जरूर है, पर सुरक्षित है। फिलहाल तो यह विकास संवाद की तरफ से उपलब्ध कराया गया है। इसे बार-बार धोकर 10 साल तक इस्तेमाल किया जा सकता है। इस तरह देखा जाए तो बहुत महंगा नहीं है। सबसे अच्छी बात यह है कि इसके उपयोग से दर्द में कमी आई है। ष्षुरू में अजीब जरूर लगा, परंतु अब सामान्य लगने लगा। माहवारी को लेकर ग्रामीण किशोरियां अब खुलकर बात करती है। आपस में एक-दूसरे से अपनी तकलीफ बताती है। इससे समाधान भी आसान हो गया। घर के बड़े बुजुर्ग भी अब इस विषय पर चर्चा करने लगे हैं।

सतना की ही तेलईचुआ विकास खंड की निशा और चौरेही की शालू की राय भी पूजा से मिलती-जुलती है। दोनों ने कहा कि पहले की अपेक्षा गांव में झिझक कम हुई है। पहले तो महिलाओं को पीरियड क्यों होता है और कैसे होता है? इस विषय से ही ग्रामीण महिलाएं और किशोरियां अनजान थी। गांव में तो इस विषय पर बात करना अच्छा नहीं माना जाता था। किसी भी किशोरी को इससे जुड़े सवाल पूछने की मनाही है। यहां तक कि वह घर की महिलाओं से भी यह प्रश्न नहीं पूछ सकती है।
मंदिरों में प्रवेश और यहां तक कि पूजन सामग्री को छूना भी पाप है। इस प्रथा को सही ठहराते हुए रीवा जिले की रागिनी कहती है्रं कि महिलाएं उस दौरान अशुद्ध होती हैं, जिन्हें हरेक चीजों से अलग रहना होता है। खाने की वस्तु भी नहीं छूनी चाहिए। जब उससे पैड्स के बारे में पूछा गया तो उसने कहा कि गांव में आज भी अधिकतर महिलाएं इसे नाली या को शौचालय की फ्लष में प्रवाहित कर देती है।

उमरिया जिले की नगीना कहती हैं कि पहले तो यहां तक कहा जाता था कि मासिक धर्म के दौरान श्रृंगार की वस्तु छूने से भी वो खराब हो जाती है। यहां की कई महिलाओं की बीच ऐसी मान्यता है कि मासिक धर्म के दौरान नहाने से गर्भाशय में पानी चला जाता है और जान का खतरा हो जाता है, इसलिए इस दौरान गांव की कई महिलाएं और किशोरियां नहाती नहीं हैं।

उमरिया जिले की बाजाकुंड विकास खंड की सरस्वती बताती है कि गांव में लड़कियों को माहवारी के बारे में कुछ नहीं बताया जाता है, क्योंकि यह बात करने का विषय नहीं है। बच्चों और पुरुषों के बीच तो यह बातें करना भी गुनाह है। माहवारी के दौरान कामकाजी महिलाओं को खेतों में काम करने जाने नहीं दिया जाता है और पैसों की तंगी के कारण कोई जाए तो उन्हें भगा दिया जाता है।

मध्य प्रदेश में आंगनबाड़ी की सेविकाओं को किशोरियों और महिलाओं बीच जागरूकता फैलाने की जिम्मेदारी दी जाती है। इसके लिए उन्हें प्रशिक्षण भी दिया जाता है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि माहवारी महिलाओं के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। इसमें सृष्टि के निर्माण के बीज होते हैं, जिन्हें पीरियड नहीं आता है, वे ना जाने कितने डॉक्टर के पास इलाज के लिए भटकती रहती हैं। मंदिर और ओझा-गुणी के पास जाकर झाड़-फूंक करने में हजारों रुपए खर्च करती हैं।

दूसरी ओर इस दौरान स्वच्छता का ध्यान न रखने और सैनिटरी नैपकिन इस्तेमाल नहीं करने से महिलाओं और किशोरियों को कई तरह की बीमारियों का सामना भी करना पड़ता है। खासकर ग्रामीण महिलाएं और किशोरियां माहवारी के समय स्वास्थ्य के प्रति जागरूक नहीं होती हैं। मजदूरी करने वाली बहुत सी महिलाओं के पास इतने पैसे भी नहीं होते कि वह ऐसे समय में सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल कर सके।लेकिन इन जिलों में विकास संवाद की ओर से मेंस्ट्रुअल कप उपलब्ध कराए जाने से उन दिनों में किशोरियां हर काम आसानी से कर लेती है।

— रूबी सरकार

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