धन्ती का संघर्ष और समुदाय का साथ
यह कहानी पोहरी विकासखंड के मचाखुर्द ग्राम की आदिवासी महिला धन्ती आदिवासी के जीवन संघर्ष को बयान करती है। धन्ती आदिवासी का जीवन संघर्ष वास्तव में तमाम सामाजिक दबाव, घरेलू हिंसा और गरीबी के कुचक्र से निपटने के एक महिला के जज्बे, जिजीविषा और साहस का प्रतीक है। उनकी कहानी हमें बताती है कि अकेली महिला के संघर्ष को पहचान कर, उसकी पीड़ा सुन-समझ कर जब समुदाय साथ खड़ा हो जाता है तो उस महिला का संघर्ष केवल उसका नहीं होता। तब साझे प्रयास से परिवर्तन न केवल संभव हो जाता है बल्कि वह स्थाई बन जाता है।
कहने को तो धन्ती आदिवासी उन अनगिनत ग्रामीण महिलाओं जैसी ही है जो वर्षों से सामाजिक परंपराओं, गरीबी, और असमानताओं के जाल में फँसी हुई हैं लेकिन इसके आगे धन्ती का जीवन नई लकीर खींचता है। वह इन महिलाओं से अलग है क्योंकि उसने समाज की बताई सीमाओं में खुद को बांधा नहीं बल्कि अपने प्रयत्नों और आत्मविश्वास से नई राह खोज ली। यह कहानी जीवंत उदाहरण है कि परिवर्तन किसी बड़ी नीतिगत योजना से ही नहीं, बल्कि एकल जागरूकता और समुदाय के साथ जुड़ाव से भी शुरू हो सकता है। फिर यह तो और विशिष्ट बात है क्योंकि एकल प्रयत्न एक महिला ने किए हैं।
अभाव और अन्याय से जीत की कहानी
धन्ती आदिवासी का परिवार आम आदिवासी परिवार की तरह निर्धन और संसाधनविहीन है। उसके परिवार में चार बेटियां, एक बेटा, वह स्वयं और उसका पति राजू शामिल हैं। उनके पास अंत्योदय योजना का राशन कार्ड है, जिससे उन्हें प्रति माह 35 किलो राशन मिलता है लेकिन यह सरकारी सुविधा उनके जीवन की कठोर वास्तविकताओं को नहीं बदलने के लिए अपर्याप्त थीं।
राजू आदिवासी दिनभर शराब के नशे में रहता और घर लौटकर धन्ती के साथ मारपीट करता। दूसरी ओर, धन्ती अपने बच्चों के पालन-पोषण के लिए आसपास के गांवों में मेहनत-मजदूरी करती। उनकी यह कमाई भी सुरक्षित नहीं रहती क्योंकि नशे के लिए राजू अक्सर पैसा छीन लेता। विरोध करने पर वह हिंसक हो उठता। वर्ष 2022 में इस अत्याचार से धन्ती इतनी त्रस्त हो गई कि डर के मारे उसने कई रातें गाँव के पास तालाब के किनारे गुजारी। वह मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक रूप से टूट चुकी थी।
सामाजिक दबाव और अधिकारों से अनभिज्ञता
धन्ती के जीवन की सबसे बड़ी चुनौती यह प्रताड़ना और हालात नहीं थे बल्कि उनकी चुनौती थी, अपने अधिकारों की जानकारी का अभाव और सामाजिक परंपराओं की गहरी जड़ें। जब परियोजना के माध्यम से उसे यह जानकारी दी गई कि पति द्वारा की जाने वाली हिंसा भी एक अपराध है और हर महिला को सुरक्षा और न्याय पाने का अधिकार है, तो वह चौंक गईं। उसके लिए यह अजूबी बात थी। वह पहले झिझकी।
धन्ती ने कहा, “हमारे समाज में पति के खिलाफ जाना गलत माना जाता है, मैं कोई झगड़ा नहीं चाहती।”
यह प्रतिक्रिया उस गहरी सामाजिक सोच को दर्शाती है जहां महिलाएं संस्कार, धर्म और परिवार की मर्यादा के कारण अत्याचार सहने को मजबूर हो जाती हैं।
धन्ती लगभग एक वर्ष तक इस पीड़ा को सहती रही। अपने बच्चों के भविष्य को देखते हुए एक मां ने हर दर्द को चुपचाप झेला। हालांकि, इसी दौरान परियोजना टीम और समूह की महिलाएं लगातार उसके संपर्क में बनी रहीं और संवाद के माध्यम से धीरे-धीरे उसमें आत्मविश्वास जगाने का प्रयास करती रहीं।
जब समूह ने बढ़ाया मदद का हाथ
धन्ती के जीवन में तब मोड़ आया जब एक दिन महिला समूह की बैठक में उसने अपना दु:ख साझा किया। बैठक में रामदुलारी आदिवासी, प्रभु आदिवासी और सुमित्रा आदिवासी मौजूद थीं। सभी ने मिलकर यह तय किया कि अब धन्ती को अकेला नहीं छोड़ा जाएगा।
समूह के सदस्यों ने धन्ती के पति राजू से मिलकर बात की। उन्होंने राजू को समझाया कि शराब पीना उसकी व्यक्तिगत पसंद और आदत हो सकती है, पर पत्नी को पीटना अपराध है। उन्होंने उसे यह भी समझाया कि अगर किसी दिन धन्ती के साथ कुछ गलत हुआ, तो उसके बच्चों की जिम्मेदारी कौन लेगा?
शुरुआत में राजू टालमटोल करता रहा पर सामूहिक बातचीत और सामाजिक दबाव का धीरे-धीरे असर हुआ। उसने कहा, “मैं अब मारपीट नहीं करूंगा पर शराब के लिए पैसे तो चाहिए।”
इस पर धन्ती ने अनूठा फैसला लेते कहा कि वह रोज 100 रुपए देगी लेकिन शर्त यही है कि वह उसे मारेगा नहीं। धन्ती का यह निर्णय अपने आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को पहचानने और स्थापित करने की शुरुआत थी।
परिवर्तन की दिशा में कदम
विकास समूह की सदस्यों सुमित्रा और रामदुलारी आदिवासी ने राजू के साथ लगातार संवाद बनाए रखा। उनके निरंतर प्रयासों का यह असर हुआ कि कुछ महीनों बाद राजू ने हिंसा पूरी तरह बंद कर दी। भले ही उसकी शराब पीने की आदत पूरी तरह नहीं छूटी, लेकिन अब वह धन्ती के साथ दुर्व्यवहार नहीं कर रहा था।
धन्ती ने नियमित रूप से समूह बैठकों में शामिल होना शुरू कर दिया। वह अन्य महिलाओं को भी समझाती कि हिंसा सहना कमजोरी नहीं, बल्कि अधिकारों के लिए आवाज उठाना ही सच्ची ताकत है।
सामूहिक नेतृत्व की शक्ति
धन्ती की कहानी एक उदाहरण है कि परिवर्तन केवल योजनाओं या कानूनों से नहीं आता, वह तब आता है जब समुदाय खुद आगे बढ़कर पहल और हस्तक्षेप करता है। धन्ती आज भी मजदूरी करती है, अपने बच्चों की शिक्षा और भविष्य के लिए संघर्षरत है, पर अब उसके भीतर डर नहीं, आत्मविश्वास है। कोर ग्रुप की महिलाओं ने यह साबित किया है कि जब समुदाय की महिलाएं मिलकर किसी अन्याय के खिलाफ खड़ी होती हैं तो सबसे कठिन सामाजिक बंधन भी ढीले पड़ जाते हैं। यह कहानी केवल धन्ती की नहीं, बल्कि हर उस महिला की है जो चुप्पी तोड़ने की हिम्मत करती है और हर उस समुदाय की है जो बदलाव की दिशा में हाथ बढ़ाता है।
