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सामुदायिक पहल से मिटा कुपोषण

मध्यप्रदेश के उमरिया जिले के आकाशकोट क्षेत्र के गांवों में सामुदायिक स्तर पर मछली पालन किया जा रहा है। वर्षा आधारित एक फसली खेती के कारण खाद्यान्न संकट से जूझने वाले इन गांवों में मछलियां कुपोषण से निपटने में मदद कर रही हैं। ऐसे ही एक गांव करौंदी की प्रेरक कहानी:

करकेली ब्लॉक में 25 गांवों का एक समूह है आकाशकोट। यह इलाका कुपोषण का शिकार है। यहां न केवल पीने के पानी का संकट है बल्कि पथरीली जमीन के कारण खेती पूरी तरह वर्षा पर निर्भर है। यहां केवल एक फसल की खेती हो पाती है और साल भर की जरूरत का अनाज भी बमुश्किल पैदा होता है। अधिकांश आदिवासी परिवार मजदूरी करने पर विवश हैं। विकास संवाद ने वर्ष 2015 में इन गांवों में समुदायों के साथ मिलकर बदलाव की साझा पहल आरंभ की।

मध्यप्रदेश के उमरिया जिले के आकाशकोट क्षेत्र के गांवों में सामुदायिक स्तर पर मछली पालन किया जा रहा है। वर्षा आधारित एक फसली खेती के कारण खाद्यान्न संकट से जूझने वाले इन गांवों में मछलियां कुपोषण से निपटने में मदद कर रही हैं। ऐसे ही एक गांव करौंदी की प्रेरक कहानी:

करकेली ब्लॉक में 25 गांवों का एक समूह है आकाशकोट। यह इलाका कुपोषण का शिकार है। यहां न केवल पीने के पानी का संकट है बल्कि पथरीली जमीन के कारण खेती पूरी तरह वर्षा पर निर्भर है। यहां केवल एक फसल की खेती हो पाती है और साल भर की जरूरत का अनाज भी बमुश्किल पैदा होता है। अधिकांश आदिवासी परिवार मजदूरी करने पर विवश हैं। विकास संवाद ने वर्ष 2015 में इन गांवों में समुदायों के साथ मिलकर बदलाव की साझा पहल आरंभ की।

करौंदी की कहानी

करौंदी उन गाँवों में से एक है। यहाँ की कुल आबादी 672 है। परिवारों के पास औसतन दो से 10 एकड़ जमीन है। ज्यादातर जमीन पथरीली और बंजर है। गांव के मध्य में तीन एकड़ का खेरदाई तालाब  है, लेकिन उसमें इतना पानी नहीं था कि सिंचाई की जा सके।

प्रारंभिक सर्वेक्षण (मार्च 2016) में जन्म से 5 वर्ष के 22  बच्चे अति कम वजन के कुपोषित पाये गए। जब गाँव में पोषण स्तर सुधारने की बात आई तो किसानों की एक बैठक में किसान राजकमल की ओर से सुझाव आया कि तालाब में मछलियों के बीज डाले जाएं। यह सुझाव अच्छा था क्योंकि मछलियां पोषण का प्रमुख स्रोत हैं।

अब सब से जरूरी था तालाब तैयार करना। वर्ष 2016 में गांव के लोगों ने श्रमदान कर के तालाब से करीब 100 ट्रॉली मलबा निकाला। इससे दो फायदे हुए: एक तो यह मलबा 10 किसानों के 10 एकड़ खेतों में डाला गया जिससे उन्हें जैविक खाद मिली, और उत्पादन में 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। वहीं दूसरी ओर तालाब की गहराई बढ़ने से वह मछलियों के उत्पादन के लिए बेहतर ढंग से तैयार हुआ।

मछली उत्पादन से बदली तस्वीर

गांव की भोजन संबंधी आदतों में बदलाव लाना जरूरी था | परंपरागत कोदो, कुटकी, रमतिला, जंगल से मिलने वाली भाजी, कंद, मौसमी भाजी आदि के उपयोग में कमी आ गई थी जिसे फिर से स्थापित करने की जरुरत थी, ताकि कुपोषण दूर किया जा सके।

वर्ष 2016 में हस्तक्षेप दस्तक महिला, युवा समूहों एवं स्थानीय समुदाय की सहायता से 3 एकड़ में फैले खेरदाई तालाब में रोहू, कतला मछलियों के 10,000 बीज विकास संवाद के सहयोग से डाले गये। इस की लागत करीब 5,000 रुपये आई। उमरिया में मछली के बीज उपलब्ध नहीं थे इसलिए एक अन्य किसान शंकर सिंह ने सतना जिले के मैहर से ये बीज मंगवाये। पहले ही वर्ष यानी 2016 में तालाब से 500 किलो मछलियां निकलीं। मछलियों का बाजार लगभग एक लाख रुपये था. मछलियां गांव के 40 परिवारों एवं 6 गर्भवती 8 धात्री, 22 कुपोषित बच्चों को मुफ्त में मिलीं। 

करौंदी निवासी बालगोविंद सिंह कहते हैं, ‘पहले गांव में मछली नहीं मिलती थी। 2016 में मछली पालन शुरू हुआ और आज हम गर्भवती, धात्री माताओं, किशोरियों और कुपोषित बच्चों वाले परिवारों को मुफ्त मछली देते हैं। इससे गांव का कुपोषण दूर हुआ है।’

मछली समिति का गठन

इस पहल के नतीजों ने लोगों के मन में उम्मीद जगायी।  2017 में बालगोविंद, भूपत, शंकर जैसे किसानों और महिला समूह की साथी सुशीला ने 10 सदस्यीय करौंदी मछली समिति का गठन किया। उन्होंने सार्वजनिक तालाब की मदद से गांव का कुपोषण मिटाने की जिम्मेदारी ली।

मछली समिति ने तय किया कि कुपोषित बच्चों, गर्भवती स्त्रियों और नवजात शिशुओं की माताओं को प्राथमिकता दी जाएगी और तालाब की मछली गांव में ही सस्ते दामों में उपलब्ध करायी जाएगी। वर्ष 2017 में मछलीपालन थोड़ा और बेहतर हुआ और इस वर्ष तालाब में पहले से दोगुना यानी 20,000 बीज डाले गये जिसकी लागत 10,000 रुपये आयी। परिणामस्वरूप तालाब से चार सौ किलो मछलियों का उत्पादन हुआ। जिसमे 60 परिवार और 8 गर्भवती, 12 धात्री, एवं 8 कुपोषित बच्चों (अतिकम वजन) वाले परिवार ने लाभ लिया। यह काम अब भी जारी है। 

भविष्य की तैयारी

इस बदलाव ने ग्रामीणों को प्रेरित किया है और समुदाय के लोगों ने यह निश्चय किया है कि इस वर्ष पुन: मछली का बीज तालाब में डालना है। समिति गांव के लोगों को 50 रुपये प्रति किलो की दर पर मछली उपलब्ध करवा रही है। मछलीपालन की आय से ही तालाब में जिंदा नाले को जोड़ने की योजना है ताकि 5 एकड़ में मछली पाली जा सके। इस वर्ष तालाब का कैचमेंट एरिया यानी जलग्रहण क्षेत्र भी तैयार किया गया है।

बच्चों पर प्रभाव

कक्षा 8 में पढ़ने वाले सुशील के पिता भूपत सिंह खेती करते हैं। साल में चार महीने उन्हें मजदूरी करनी पड़ती है। भूपत का परिवार पहले मछली नहीं खाता था। इक्का दुक्का लोग जरूर तालाब में मछली पकड़ा करते थे। परंतु समिति बनने के बाद जब से यह काम संगठित ढंग से शुरू हुआ है, उनका परिवार भी मछली खाने लगा है। भोजन में मछली के शामिल होने का असर बच्चों के स्वास्थ्य पर भी पड़ा है और सुशील अब पहले से अधिक स्वस्थ और मजबूत दिखता है।

व्यापक समुदाय पर असर

करौंदी में पोषण में हुआ सुधार बच्चों और माताओं में स्पष्ट नजर  आता है। वहां अति कम वजन का कोई बच्चा नहीं रह गया है। करौंदी में कोई बच्चा अति गंभीर कुपोषित नहीं है।

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता आशा सिंह कहती हैं, ‘शुरुआत में लोग सहयोग कम करते थे। कुपोषण ज्यादा रहता। बैठकें शुरू होने के बाद सहयोग की भावना पैदा हुई। संस्था ने आंगनबाड़ी में महामास तेल और छीर पाक की व्यवस्था की और बालवाड़ी की शुरुआत की। अब गांव में कुपोषण कम हुआ है और एक भी बच्चा अति कुपोषित नहीं है।’

बैगा आदिवासी गुलाब बाई कहती हैं, ‘मेरी बेटी काजल जन्म से ही कमजोर थी। लोग कहते थे उसे सूखा रोग हो गया है। दस्तक महिला समूह की बैठक में जाने पर मुझे कुपोषण के बारे में जानकारी मिली। मैंने उसे रोज बालवाड़ी भेजना शुरू किया। अब वह कुपोषण से दूर है। मेरे पति मछली पालन से जुड़े हैं और हमें खाने के लिए मछलियां भी मिलती हैं।’

खानपान में 30 परिवार जरूरत अनुसार मछली का उपयोग करने लगे और गांव में अब कोदो कुटकी बदल कर चावल लेने की प्रक्रिया बंद हुई। समुदाय अपने उत्पाद खुद खाता है। क्षेत्र के अन्य गांवों में जहां छोटे-छोटे तालाब थे वहां भी पांच गांवों में सामुदायिक स्तर पर मछली पालन शुरू हो चुका है। करौंदी, बिरहुलिया, जंगेला, सूरजपुरा और माली के लोगों ने सामुदायिक बैठक करके समूह का गठन किया और तय किया की संस्था की मदद से मिलने वाले मछली बीज से एक स्थाई व्यवस्था बनाई जाएगी जिससे गांव में कुपोषित बच्चों, गर्भवती, धात्री माताओं को मुफ्त तथा गांव के अन्य लोगों को सस्ते दामों में मछली खाने को मिल सकेगी।

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Vikas Samvad is a research, documentation and capacity building organisation for building a team of socially sensitive cadre, communicators and organised groups with a child centric perspective.

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