‘सिलाई मास्टरनी’ रवीना की कहानी
शिवपुरी जिले के एक छोटे से गांव में जन्मी और पली-बढ़ी रवीना एक साधारण ग्रामीण महिला है। गांवों की परंपरा के अनुसार उसका विवाह बहुत कम उम्र में हुआ था। शुरुआत के कुछ साल ठीक रहे लेकिन धीरे-धीरे उसका जीवन घरेलू हिंसा, अपमान और डर के जाल में उलझता गया। पति शराब का आदी था और उसकी यह आदत रोज झगड़े का कारण बनीत। बच्चों के सामने रवीना का आत्म सम्मान रोज टूटता था।
मायके में रवीना को सिखाया गया था कि ‘घर की बातें घर में ही रहती हैं’, इसलिए वह वर्षों तक चुप रही। वह न तो परिवार से कुछ कह पाती, न पड़ोस से। धीरे-धीरे वह भीतर से टूटने लगी। बच्चों की परवरिश, घर का काम और अपमान के बोझ से उनका जीवन मुरझा गया था।
कहते हैं कि हर कहानी में एक मोड़ होता है। रवीना की जिंदगी में यह मोड़ तब आया जब गांव में महिलाओं का स्व-सहायता समूह (Self Help Group) बना। शुरुआत में वह केवल देखने के लिए समूह की बैठकों में जाती थी लेकिन जब उसने अन्य महिलाओं को अपने दु:ख साझा करते देखा तो उसके भीतर का डर थोड़ा कम हुआ। समूह में उसने पहली बार उसने अपने साथ हुई हिंसा के बारे में खुलकर बात की।
समूह की महिलाओं ने न केवल उसकी बात सुनी, बल्कि उसे यह भरोसा भी दिलाया कि वह अकेली नहीं हैं। संस्था के सहयोग से उसे परामर्श मिला। पहली बार किसी ने उससे यह पूछा, “आप क्या चाहती हैं?”
यह सवाल उसके जीवन का सबसे बड़ा परिवर्तन ले आया। रवीना ने सिलाई सीखनी शुरू की। यह शुरुआत भले छोटी थी लेकिन उसके लिए यह आत्मनिर्भरता की पहली सीढ़ी थी। उसने गांव के बच्चों के कपड़े सिलने शुरू किए और धीरे-धीरे उसकी पहचान ‘पीड़िता’ से बदलकर ‘सिलाई मास्टरनी’ के रूप में बन गई।
अब रवीना के पास अपनी कमाई थी, जो शायद बहुत बड़ी नहीं थी, लेकिन इतनी जरूर थी कि वह अपने बच्चों की फीस भर सके। घर के लिए राशन खरीद सके और अपने निर्णय खुद ले सके। उसने स्वयं की नई पहचान गढ़ी। अब वह केवल किसी की पत्नी नहीं थी, बल्कि एक निर्णय लेने वाली महिला थी।
गांव के लोग पहले उसकी स्थिति पर दया दिखाते थे, अब ‘रवीना दीदी’ कहकर सम्मान देने लगे। उसने महिलाओं के लिए छोटे जागरूकता सत्र शुरू किए जहां वह घरेलू हिंसा के खिलाफ बोलने, आत्मनिर्भर बनने और सरकारी योजनाओं तक पहुंच बनाने की जानकारी साझा करती है।
उसकी सफलता दिखाती है कि समाज तब बदलता है जब एक महिला अपने डर से आगे बढ़कर बोलने लगती है। उसकी आवाज ही परिवर्तन की पहली गूंज बनती है।
सामाजिक संरचना और संघर्ष की सीख
रवीना की कहानी केवल एक व्यक्ति के साहस की नहीं, बल्कि उस सामाजिक संरचना की कहानी है जो धीरे-धीरे बदल रही है। गांव में पहले महिलाओं की समस्याओं को ‘घर का मामला’ कह कर छिपाया जाता था पर अब महिला समूह, स्थानीय संस्थाएं और सरकारी योजनाएं उन्हें अपनी बात कहने का एक मंच दे रही हैं।
इस अनुभव से कई महत्वपूर्ण सीखें निकलती हैं:
- आर्थिक आत्मनिर्भरता महिलाओं की सशक्तीकरण की कुंजी है। जब महिलाएं अपने पैरों पर खड़ी होती हैं तो वे निर्णय लेने में समर्थ बन पाती हैं और अपने साथ हो रही हिंसा का विरोध करने की हिम्मत जुटा पाती हैं।
- सामुदायिक सहयोग परिवर्तन की आधारशिला है। जब महिलाएं समूहों में जुड़ती हैं तब वे न केवल एक-दूसरे के अनुभव सुनती हैं बल्कि सामूहिक रूप से बदलाव का हौसला भी पाती हैं।
- सामाजिक संस्थाओं और सरकारी योजनाओं की भूमिका निर्णायक होती है। यदि महिलाओं को समय पर परामर्श, आजीविका प्रशिक्षण और कानूनी सहायता मिले तो वे हिंसा के चक्र को तोड़ सकती हैं।
- मानसिक स्वास्थ्य और आत्मसम्मान को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। हिंसा का असर केवल शारीरिक नहीं, बल्कि भावनात्मक भी होता है। इसलिए सहायता में काउंसलिंग और पुनर्वास की भूमिका अहम है।
यह अनुभव उस क्रांति का प्रतीक है जो गांवों में, घर-आंगन में, दीवारों के पीछे और महिलाओं की आंखों की चमक में धीरे-धीरे आकार ले रही है। रवीना आज बदली हुई महिला है। वह संवेदनशील, आत्मविश्वासी और दूसरों के लिए प्रेरणास्रोत है। वह अब अपने गांव की अन्य महिलाओं को कहती है, “डर कर नहीं, डटकर जीना सीखो।”
