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मुर्गीपालन से दूर हुआ सहरिया समुदाय का कुपोषण

शिवपुरी जिले में सहरिया आदिवासियों की 11.27 प्रतिशत है। ये आदिवासी छोटी-छोटी बसाहटों में रहते हैं। समुदाय की आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं है, इसका असर साफतौर पर उनके पोषण पर दिखाई देता है। सहरिया के पास कृषि भूमि कम रही है। वे जंगलों से जड़ी-बूटी एकत्रित कर उसे बेचकर आजीविका चलाते रहे हैं। जंगलों के कम होते जाने का असर उनके इस काम पर भी पड़ा है। अब ज्यादातर परिवार या तो बड़े किसानों के यहां मजदूरी करते हैं या या भवन निर्माण में, पत्थर खदानों में काम करने पर विवश हैं। स्थानीय स्तर पर काम नहीं मिलता तो ये पलायन भी कर जाते हैं। इन परिस्थितियों में उनका पोषण बुरी तरह प्रभावित होता है, गरीबी के चलते संतुलित और पोषक आहार सपने के समान है। ये समुदाय पोषण के लिए सरकारी खाद्यान्न पर निर्भर हैं।

पोषण की स्थिति

राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के अनुसार सहरिया समुदाय में पांच वर्ष तक की उम्र के 49.6 प्रतिशत बच्चे कुपोषित है, जो औसत कुपोषण से अधिक है। इस समुदाय के 35 प्रतिशत वयस्कों में अल्पपोषण है जबकि 15 से 49 वर्ष उम्र की महिलाओं में 48.7 प्रतिशत रक्ताल्पता की शिकार हैं। इसका असर यहाँ के बच्चों की अधिक मृत्यु दर के रूप में सामने आता रहा है.

इन परिस्थितियों के बीच विकास संवाद समिति ने वर्ष 2017 में पोहरी विकासखंड के 15 गांवों में समुदाय आधारित कुपोषण प्रबंधन परियोजना की शुरुआत की। मकसद था समुदाय में कुपोषण और अल्पपोषण की स्थिति को समन्वित प्रयासों द्वारा बेहतर बनाना. इसके लिए एक ओर समुदाय को सशक्त करना जरूरी वहीं दूसरी ओर उनको हर तरह से सहयोग करना था। इसके लिए एक ऐसी सोच का विकास करना जरूरी था जहां पर एक लक्ष्य को लेकर सरकार की विभिन्न योजनाओं का संविलियन भी हो सके ताकि बेहतर और टिकाउ परिणाम जल्द सामने आ सकें। इसके लिए किचन गार्डन लगाना, समुदाय में पानी के स्त्रोतों को पुर्नजीवित करना, परम्परागत खादय व्यवस्थाओं को मजबूत करना, स्वच्छता व्यवहार, सरकारी योजनाओं का अधिकतम लाभ प्राप्त करना, आंगनवाड़ी, स्कूलों को बेहतर बनाना आदि की रणनीति बनाई गई।

एक विचार आया कि क्यों न मुर्गीपालन को समुदाय में पुन: स्थापित किया जाए, सहरिया आदिवासी परिवारों में मुर्गीपालन होता रहा है, इससे उन्हें पहले पोषण भी मिल जाता था और आजीविका का सहारा भी था। पर कई वजहों से वह या तो कम हो गया, या लगभग खत्म ही हो गया।

पर यह हो कैसे ? इसके लिए पशुपालन विभाग के साथ तालमेल किया गया। सहरिया समुदाय के लोगों को कड़कनाथ प्रजाति के मुर्गीपालन के लिए प्रशिक्षित किया गया। पशुपालन विभाग के साथ मिलकर वर्ष 2017-18 में 44 परिवारों को मुर्गीपालन करवाया गया। प्रत्येक परिवार को 45 चूजे दिये गये तथा मुर्गी का दड़बा बनाने के लिए भी 1200 रुपये प्रदान किए गए। कुल 1980 चूजे तथा 52,800 रुपए दिए। साल 2020 में 50 परिवारों को कड़कनाथ प्रजाति के 1000 चूजे वितरित किए गए। इस पहल को यहाँ इतना अच्छा प्रतिसाद मिला कि अब ब्लाक के 15 गांवों के 874 परिवार मुर्गीपालन कर रहे हैं। जाखनौद, सोनीपुरा, रामपुरा, जटवारा, मेहरा, डांगवर्वे, आमई, पटपरी, नोन्हेटा खुर्द, मचाखुर्द, बटकाखेड़ी, ग्वालीपुरा, टपरपुरा, माधोपुरा और मडखेड़ा के निवासियों के लिए मुर्गीपालन एक सहारा बन गया है।

कैसे बदला मचाखुर्द

मचाखुर्द वह गांव है जहाँ मुर्गीपालन का असर बहुत साफ़ दिखाई देता है. यहाँ सहरिया समुदाय के 68 और हरिजन समुदाय के 41 परिवार रहते हैं। सहरिया समुदाय में प्रति परिवार बमुश्किल दो से तीन बीघा जमीन है और वह भी पथरीली। यहां केवल एक फसल होती है और वह भी मानसून पर निर्भर है। दो आंगनवाड़ी में 89 बच्चे पंजीकृत हैं। एक प्राथमिक पाठशाला भी है। उप स्वास्थ्य केंद्र छह किमी दूर देवरीखुर्द में है। विकास संवाद ने मचाखुर्द में किचन गार्डन तैयार करने और तालाब गहरा करने का काम तो किया ही, साथ ही सुरक्षित मातृत्व और ग्रामीण स्वास्थ्य, स्वास्थ्य एवं पोषण समितियों के काम की निगरानी तथा क्षमता वृद्धि का काम भी किया जा रहा है।

इस गाँव में लोगों ने मुर्गीपालन शुरू किया. कुछ ही महीनों में मुर्गियों ने अंडे देना शुरू कर दिया। इससे भोजन में अंडा भी शामिल हो गया. जल्दी ही बाहर से लोग मुर्ग खरीदने पोहरी आने लगे। हालांकि मुर्ग तभी बेचे जाते जब कोई विशेष आवश्यकता होती। जैसे किसी बीमारी की वजह से या किसी अन्य जरूरत के वक्त। इस तरह समुदाय कर्ज जैसी समस्या से भी बच रहा था। कड़कनाथ प्रजाति के एक अंडे का मूल्य 10 रुपए है जबकि एक मुर्गा 500 से 600 रुपए में बिकता है।

गाँव की सुमित्रा, दुलारी, हक्के आदिवासी, हक्को और रमेश ने बताया कि पहले हम अच्छा खाना 3-4 माह में खाते थे, पर अब हमारा खाना पहले से बेहतर है. सप्ताह में सब्जी 3 बार, दाल सप्ताह में 2 बार और हरी पत्तेदार सब्जी सप्ताह में एक बार खा लेते हैं. मुर्गा और अंडा एक माह में तीन से चार बार बन जाता है व बच्चे अंडे सप्ताह में लगभग दो से तीन दिन खा रहे हैं. वर्ष 2017 में जिस समय यहाँ समुदाय आधारित कुपोषण प्रबंधन परियोजना शुरू की थी उस समय 89 बच्चों में से 15 अतिगंभीर कुपोषित थे, जबकि 46 बच्चों का वजन सामान्य से कम था। आंगनवाडी के डेटा के अनुसार अब कम वजन के केवल 6.25 प्रतिशत बच्चे हैं, जबकि माध्यम श्रेणी में 38.8 प्रतिशत हैं।

नैनी की कहानी: बेहतर स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता

नैनी आदिवासी भी उन लोगों में शामिल है जिन्हें चूजे दिए गए थे। नैनी की बेटी वंदना अप्रैल 2018 में गंभीर कुपोषित थी। 19 माह की उम्र में उसका वजन केवल 7 किलो 100 ग्राम था। पोषण पुनर्वास केंद्र में इलाज के बाद जब वह घर वापस आयी तो उसे रोज एक अंडा खिलाना शुरू किया गया। धीरे-धीरे वंदना का वजन बढ़ने लगा और कुछ ही महीनों में उसकी स्थिति सामान्य हो गयी। दूसरी बेटी संजना की तबियत बिगड़ने पर उसने 1000 रुपये में दो मुर्गी बेचकर उसका इलाज कराया।

इसी गाँव की तुलसा आदिवासी ने 1100 रुपये के अंडे बेचे। उनकी बेटी नीलम भी अति कुपोषित थी। मुर्गीपालन से पैसे भी आये और बच्ची का कुपोषण भी दूर हुआ। नीलम की मां ने उसे दो माह तक अंडे खिलाये और वह धीरे-धीरे स्वस्थ हो गयी।

हमारे गाँव में कई बदलाव देखने को मिले हैं, सभी परिवारों को मुर्गीपालन करवाया गया जिससे भोजन में अंडा और मांस शामिल हुआ है. किचिन गार्डन लगवाए गए हैं, जिससे हरी सब्जी खाने को मिलती है, तालाब का गहरीकरण करवाए जाने से कुछ परिवारों की जमीन पर फसल होने लगी है। इन सब का असर साफ़ दिखाई देता है कुपोषण में कमी आई है।

भारती परिहार, आंगनवाडी कार्यकर्ता मचाखुर्द

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