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संक्रमित होना अपराध नहीं, इसे सहजता से स्वीकार करें

राकेश कुमार मालवीय

हमारे समाज में बीमारियों को छिपाने की परम्परा रही है। बात केवल उस एचआईवी एड्स की नहीं है, जिसे सबसे ज्यादा छिपाया जाता है, जिसका एक कारण एकाधिक यौन संबंध भी है, पर ऐसा नहीं है कि केवल उसके कारण ही एड्स होता हो। टीबी जब तक और लोगों के सामने आती हैं, तब तक वह और फैल चुकी होती हैं। महिलाओं में भी कई तरह की ऐसी बीमारियां हैं, जो समय पर नहीं बताने के कारण बड़ी हो जाती हैं,माहवारी जैसे प्राकृतिक व्यवहारों के प्रति भी एक ग्रंथि है। हमारी पृ​ष्ठभूमि का यह व्यवहार अब कोविड जैसी महामारी में अ​भिशाप साबित हो रहा है, यह इस महामारी को भयावह बना रहा है, और ज्यादा बढ़ा रहा है।

कुछ उदाहरण देखिए, हमारे एक परिचित जो संयुक्त परिवार में रहते हैं, उनके एक सदस्य को संक्रमण हुआ। उन्होंने सुरक्षा उपायों को ठीक से पालन नहीं किया। जैसे ही बुखार कम होता वह उठकर मेन गेट तक चले आते। एक दो बार अपनी दुकान तक भी हो आए। इस पर जब मैंने फोन से उनको कहना चाहा तो परिजन का कहना था कि घर में पड़े—पड़े तो और ज्यादा बीमार हो जाएंगे। बाहर निकलते हैं तो मूड चेंज होता है। इलाज में भी लापरवाही चलती रही। नौबत यह आई कि एक दिन रात को जब सांस लेने में बहुत ज्यादा तकलीफ होने लगी तो उन्हें अस्पताल ले जाया गया। 15 दिन भर्ती रहे। इस बीच उनके घर के सात-आठ और सदस्यों को संक्रमण हुआ,लेकिन अन्य सदस्य भी पहले मानने को तैयार नहीं थे कि उन्हें कोविड-19 है। अंतत: एक बुजुर्ग की मृत्यु हो गई। यदि उस पहले व्यक्ति ने इस चेन को बढ़ने नहीं दिया होता तो शायद उनका पूरा परिवार इससे बचा रह सकता था।

एक दूसरे परिचित तो टेस्ट करवाने को ही राजी नहीं हुए। सारे लक्षण होते हुए भी उनकी एक ही बात कि हमें कोरोना-वोरोना थोड़े ही है। हालात यह हैं कि तीन सदस्यों वाले उनके परिवार में तीनों ही बीमार हैं। चौथे पारिवारिक सदस्य उनको देखने गए, वह अपने साथ वापस संक्रमण लेकर आए। इससे उनकी पत्नी और फिर दो साल का बच्चा भी संक्रमण का शिकार हो गया। यदि थोड़ी सी समझदारी रखी जाती तो हो सकता था कि पत्नी, बच्चा और वह खुद भी बच सकते थे।

एक और परिवार के पांच सदस्य घर से दस-पंद्रह दिन निकले ही नहीं। बाद में उनका कहना था कि यदि टेस्ट करवाते तो पक्का था कि पॉजीटिव निकलते। क्या जांचें नहीं करवा कर उन्होंने कोई बहादुरी का काम कर लिया ?

कॉलोनी के व्हाटएप्प ग्रुप पर कई लोग अपने पॉजीटिव होने की सूचना खुद दे देते हैं, लेकिन कई सदस्यों का पता इधर-उधर से ही चलता है। कई लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से टोकाटाकी करने पर वह खुलासा करते हैं।

इन सभी मानवीय व्यवहारों को देखकर लगता है कि क्या कोरोना शर्म का विषय है, या बहादुरी का विषय है ? क्या पॉजीटिव होने से कोई व्यक्ति अपराधी हो जाता है ? क्या उसने ऐसा कोई पाप कर दिया है जिसे दुनिया को नहीं बताया जा सके। क्या इससे उसकी छवि ख़राब हो जाएगी ? या कोई दूसरा बड़ा नुकसान हो जाएगा ? या क्या संसार में कोई ऐसा महाबली मनुष्य है जिसे कोरोना हो ही नहीं सकता।

इस वक्त समाज के हर व्यक्ति को यह समझ लेना चाहिए कि कोविड संक्रमण का शिकार होना कोई अपराध नहीं है, उसे सहजता से स्वीकार कर लेने में ही खुद की और समाज की भलाई है। अब जबकि यह महामारी कस्बाई, ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों तक भी पहुंच रही है, तब यह और भी जरूरी हो जाता है।

हम कह जरूर रहे हैं कि कोविड का वायरस अब खुद को ज्यादा मजबूत करके लौटा है, अब वह पूरे परिवार को प्रभावित कर रहा है, पर वायरस पर इल्जाम लगाने से पहले जरा अपने आसपास के व्यवहारों को देख लें। हम कितनी ईमानदारी से कोविड प्रोटोकॉल का पालन कर रहे हैं। इसका एक कारण यह भी है कि हम सिर्फ अपने लिए सोचते हैं, और दूसरों का हमें बिलकुल भी ख्याल नहीं है। कोविड 19 का यह भी सबक है कि आपको खुद के साथ दूसरों के लिए भी सोचना चाहिए, आपकी वह एक गलती, लौटकर आपके पास वापस आ सकती है और आप खुद इसका शिकार हो सकते हैं।

हमें यह भी समझ लेना चाहिए कि संक्रमित होने के बाद हमें अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी है और जब तक संभव हो इसमें दूसरों को अपने कम से कम पास आने दें। उनका मोरल सपोर्ट लें। कोई आपसे मिलने आ रहा हो तो उससे मना करें, डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल करें और अपने मनोबल को बनाए रखें। यह आपके परिजन को भी सुरक्षित रखेगा और देश पर दिनों दिन बढ़ते बोझ को भी कम करेगा।

यहां हमें यह भी समझना चाहिए ​कि महामारी से लड़ने के लिए आपको विज्ञान आधारित दृष्टिकोण और तार्किक व्यवहार की जरुरत होती है। यह केवल सरकार की अकेले की लड़ाई ही नहीं होती, इसमें समाज का व्यवहार भी बहुत निर्णायक भूमिका अदा करता है। बदकिस्मती से हमारे यहां इन दोनों ही चेतनाओं का अभाव है, हमारा अंधविश्वासों पर खूब विश्वास रहा है और हम तार्किक आधारों पर नहीं बल्कि देखादेखी करने वाले समाज का हिस्सा रहे हैं।

हम इसे खांचों में भरपूर पूर्वाग्रहों के साथ भी देखते रहे हैं, इसकी तोहमतों को भी बिना किसी पक्के आधार पर दूसरों पर थोपते रहे हैं, अंतत: इसका खामियाजा भी हमें ही भुगतना पड़ रहा है। सोचिए कि हमने अपना किस—किस तरह से नुकसान किया और लगातार करते ही जा रहे हैं। हमारी अपनी गलतियों के कारण आज इस महामारी की सबसे वीभत्स तस्वीरें हमारे अपने देश से निकलकर आ रही हैं। क्या हम इन तस्वीरों पर शर्मशार हैं। यदि हां, तो आज हमें इस बात पर भरपूर चिंतन करने की जरूरत है कि कोविड 19 की इस महामारी की रोकथाम में मेरा अपना क्या योगदान है ?

( यह लेखक के अपने विचार हैं)

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